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चरक संहिता अनुसार पित्त दोष उपचार की मूल अवधारणा

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चरक संहिता में पित्त दोष की प्रकृति तथा उसकी चिकित्सा का वर्णन विभिन्न प्रसंगों में किया गया है। कहीं यह विषय संक्षेप में उदाहरणों और कथाओं के माध्यम से बताया गया है, तो कहीं विस्तारपूर्वक चिकित्सात्मक संदर्भ में वर्णित है। इस लेख में हम ग्रन्थोक्त पित्त दोष चिकित्सा से संबंधित समग्र विचारों का अवलोकन करेंगे।

मेरे मत में यदि चरक संहिता के उदावर्त एवं ग्रहणी प्रकरण में वर्णित पित्त दोष की चिकित्सा विधि को सही प्रकार से समझ लिया जाए, तो वर्तमान समय में प्रचलित अधिकांश पित्त विकारों की चिकित्सा अत्यंत प्रभावी रूप से की जा सकती है। इसका प्रमुख कारण यह है कि आजकल अधिकांश रोगी गलत आहार-विहार के कारण उत्पन्न उदावर्त, ग्रहणी तथा मंदाग्नि जैसी अवस्थाओं से ग्रस्त पाए जाते हैं, जिनका मूल कारण पित्त दोष का असंतुलन ही होता है।

आयुर्वेद में दोष सिद्धांत का संक्षिप्त परिचय

आयुर्वेद के अनुसार मानव शरीर केवल मांस, रक्त और अस्थियों का ढांचा नहीं है, बल्कि यह दोष, धातु और मल के संतुलन से बना एक जीवंत तंत्र है। 
चरक संहिता में स्पष्ट कहा गया है—
“दोषधातुमलमूलं हि शरीरम्” (चरक संहिता, सूत्रस्थान)
अर्थात् शरीर का मूल आधार दोष, धातु और मल हैं।
इन तीनों में दोष सबसे अधिक महत्वपूर्ण माने गए हैं, क्योंकि दोष ही धातुओं और मल की उत्पत्ति, वृद्धि और क्षय को नियंत्रित करते हैं।

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दोष क्या हैं ?

आयुर्वेद में दोष वे जैविक शक्तियाँ हैं जो शरीर की सभी शारीरिक, मानसिक और क्रियात्मक गतिविधियों को संचालित करती हैं। ये दोष पंचमहाभूतों से उत्पन्न होते हैं और शरीर में निरंतर सक्रिय रहते हैं।
आयुर्वेद तीन मुख्य दोषों को स्वीकार करता है—
वात दोष (वायु + आकाश)
पित्त दोष (अग्नि + जल)
कफ दोष (जल + पृथ्वी)

दोषों का कार्यात्मक महत्व

  1. वात दोष गति, संचार और स्नायु क्रियाओं का संचालन करता है।
  2. पित्त दोष पाचन, ऊष्मा, बुद्धि और तेज का नियंत्रण करता है।
  3. कफ दोष स्थिरता, बल, स्निग्धता और संरचना प्रदान करता है।

चरक संहिता के अनुसार जब ये तीनों दोष संतुलन अवस्था में रहते हैं, तब व्यक्ति स्वस्थ रहता है। और जब इनमें से कोई भी दोष असंतुलित (वृद्धि या क्षय) हो जाता है, तब रोगों की उत्पत्ति होती है।

स्वास्थ्य और रोग का आधार

आयुर्वेद का मूल सिद्धांत है—
“समदोषः समाग्निश्च समधातुमलक्रियाः।
प्रसन्नात्मेन्द्रियमनाः स्वस्थ इत्यभिधीयते॥”
(चरक संहिता, सूत्रस्थान)
अर्थात् जिस व्यक्ति के दोष, अग्नि, धातु और मल सम अवस्था में हों तथा मन, इंद्रियाँ और आत्मा प्रसन्न हों, वही वास्तव में स्वस्थ कहलाता है।
निष्कर्ष
इस प्रकार दोष सिद्धांत आयुर्वेद की आत्मा है। किसी भी रोग को समझने और उसका उपचार करने से पहले दोषों की प्रकृति, अवस्था और असंतुलन को जानना अनिवार्य है। आगे पित्त दोष के विषय में इसी दोष सिद्धांत के आधार पर विस्तार से विवेचना की जाएगी।

नोट:-आयुर्वेदिक चिकित्सा करने के लिए वैद्य को सिर्फ दोषों का ही निरीक्षण करना है। जिस प्रकार से खांसी में प्रयोग किए जाने वाले एलोपैथिक दवाई लगभग सभी रोगी को काम करता है मगर आयुर्वेद में ऐसा नहीं है आयुर्वेद में खांसी ठीक करने वाला काली मिर्च पित्त दोष से उत्पन्न खांसी को और भी बढ़ा देता है हालांकि काली मिर्च खांसी में दी जाने वाली एक सामान्य जड़ी बूटी है।

pitta dosh ki treatment

 पित्त दोष क्या है? (What is Pitta Dosha)

यह लेख केवल पित्त दोष को केंद्र में रखकर लिखा गया है। अतः इसमें पित्त दोष क्या है तथा उसकी चिकित्सा करते समय किन-किन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए, इसी विषय पर चर्चा की जाएगी। कृपया ध्यान दें कि यह लेख चरक संहिता के चिकित्सा स्थान में वर्णित ग्रहणी रोग एवं उदावर्त रोग के आधार पर तैयार किया गया है।

पित्त दोष की परिभाषा (चरक अनुसार)

पित्त का स्वरूप एवं गुणधर्म के बारे में चर्चा करते हुए चरक ने कहा है 
सस्नेहमुष्णं तीक्ष्णं च द्रवमम्लं सरं कटु । (च.स. कटु' (च.सू. 1:60)'

अर्थात् हमारे शरीर में जहाँ-जहाँ किसी भाव या द्रव्य में तेल जैसी स्निग्धता, उष्णता, अम्ल के समान तीक्ष्णता, गर्म एवं द्रव स्वरूप, खट्टा या मिर्च-मसालेदार कटु रस तथा फैलने या प्रवाहित होने की शक्ति के साथ कोई क्रिया होती है, उन सभी कार्यों को सामूहिक रूप से पित्त कर्म कहा जाता है।

पित्त दोष कैसे बढ़ता है 

ऊपर वर्णित शारीर भाव पदार्थ की वृद्धि बाहर के जिस वस्तु से होगा उसके अधिक सेवन से पित्त की वृद्धि होगी जैसे काली मिर्च शरीर के अंदर जाकर अपने ही तिक्ष्ण गुण को बढ़ाता है, क्योंकि तिक्ष्ण यह गुण पित्त का एक कर्म है इसीलिए काली मिर्च के अधिक सेवन से पित्त बढ़ता है ऐसा व्यवहार में बताया जाता है। वैसे बताना तो यह चाहिए था कि शरीर के अंदर पित्त के तिक्ष्ण गुण बढ़ा है।


पंचमहाभूतों से पित्त की उत्पत्ति (अग्नि + जल)

आयुर्वेद के अनुसार पंचमहाभूतों में अग्नि और जल महाभूत पित्त दोष के प्रत्यक्ष कारण माने गए हैं। प्रकृति में जहाँ-जहाँ अग्नि और जल का संयोग होता है, वहाँ-वहाँ पित्त का अंश अवश्य विद्यमान रहता है। यही कारण है कि शरीर के भीतर होने वाली सभी ऊष्मा, पाचन और रूपांतरण संबंधी क्रियाएँ पित्त दोष द्वारा नियंत्रित होती हैं।

पित्त दोष के व्यवहार और उसकी वृद्धि-क्षय की प्रक्रिया को सही रूप से समझने के लिए यह आवश्यक है कि हम पहले यह जानें कि अग्नि और जल महाभूत किन-किन रसों में प्रधान रूप से विद्यमान रहते हैं। क्योंकि रसों के माध्यम से ही पंचमहाभूत शरीर में प्रवेश करते हैं और दोषों को प्रभावित करते हैं।

नीचे उन प्रमुख रसों का उल्लेख किया जा रहा है जिनमें अग्नि तत्व की प्रधानता पाई जाती है और जो पित्त दोष की वृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

अग्नि तत्व युक्त रस, पित्त वृद्धि और चिकित्सकीय विवेचना

आयुर्वेद के अनुसार पित्त दोष की वृद्धि और उसके विकारों को समझने में रसों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। लवण, अम्ल और कटु—ये तीनों रस अग्नि तत्व से युक्त होते हैं, इसलिए इनका अधिक सेवन पित्त दोष को बढ़ाता है।
लवण रस में अग्नि तत्व उष्ण, स्निग्ध और द्रव गुणों के माध्यम से तथा जल महाभूत स्निग्धता और द्रवता के रूप में विद्यमान रहता है। इसी कारण लवण रस शरीर में ऊष्मा और द्रवता बढ़ाकर पित्त को उत्तेजित करता है।
अम्ल रस में अग्नि तत्व स्निग्ध, उष्ण और लघु गुणों से प्रकट होता है, जो जठराग्नि को प्रदीप्त करता है, किंतु अधिक मात्रा में सेवन करने पर पित्त की तीक्ष्णता और दाह को बढ़ा देता है।
कटु रस में अग्नि तत्व की प्रधानता उष्ण, रूक्ष और लघु गुणों के कारण होती है, जिससे पित्त में तीव्रता, रूक्षता और शोष के लक्षण उत्पन्न हो सकते हैं।

व्यावहारिक रूप से यदि किसी व्यक्ति को काली मिर्च के सेवन से पित्त बढ़ने के लक्षण दिखाई देते हैं, तो इसे इस प्रकार समझना चाहिए कि काली मिर्च में विद्यमान उष्ण, रूक्ष और लघु गुण शरीर में पित्त के समान गुणों की वृद्धि कर रहे हैं। यहाँ वास्तव में पित्त नहीं, बल्कि पित्त के गुण बढ़ते हैं।
इसी सिद्धांत के आधार पर पित्ताशय (Gallbladder) में पथरी का निर्माण भी प्रायः लवण या कटु रस प्रधान पित्त वृद्धि के कारण होता है। रोगी के लक्षणों का सूक्ष्म निरीक्षण करने पर यह आसानी से निर्धारित किया जा सकता है कि पथरी लवण रस प्रधान पित्त से उत्पन्न हुई है या कटु रस प्रधान पित्त से। यदि रोगी के शरीर में रूक्षता अधिक दिखाई देती है, तो यह संकेत होता है कि पथरी कटु रस प्रधान पित्त के कारण बनी है।

निष्कर्षतः, जब वैद्य इस प्रकार दोषों में रसों का समीकरण स्थापित कर सूक्ष्म विवेचना करता है, तब चिकित्सा सरल, सटीक और अत्यंत प्रभावी हो जाती है। पित्त दोष की आगे की चिकित्सा विधियों को समझने के लिए इस ब्लॉग को निरंतर पढ़ते रहें।

नीचे दिया गया पूरा अंश जुड़ा हुआ, शुद्ध, प्रवाहयुक्त और ब्लॉग-रेडी हिंदी में प्रस्तुत है, जिसमें शास्त्रीय संदर्भ, चिकित्सकीय स्पष्टता और SEO-friendly संरचना का ध्यान रखा गया है:


पित्त दोष का मुख्य कार्य एवं स्थान

आयुर्वेद के अनुसार पित्त दोष शरीर में पाचन, ऊष्मा, वर्ण, तेज, बुद्धि तथा रूपांतरण से संबंधित समस्त क्रियाओं का संचालन करता है। जब पित्त अपने स्वाभाविक कर्म से बढ़ता है, तो उसका प्रभाव शरीर के कुछ विशिष्ट स्थानों में स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगता है।

चरक संहिता के अनुसार पित्त के प्रमुख स्थान इस प्रकार हैं—

  • स्वेद (पसीना)

  • रस (प्लाज्मा एवं प्लेटलेट्स)

  • लसीका (Lymph)

  • रुधिर (रक्त)

  • आमाशय (Stomach – विशेष रूप से)

“स्वेदो रसो लसीका रुधिरमामाशयश्च पित्तस्थानानि,
तत्रापि आमाशयो विशेषेण।”

(चरक संहिता)

अर्थात् पित्त दोष का मुख्य स्थान आमाशय है, और वहीं से यह अन्य धातुओं एवं स्रोतसों को प्रभावित करता है। जब पित्त अपने-अपने कर्म से अत्यधिक बढ़ जाता है, तो उसका दुष्प्रभाव सबसे पहले पसीना, रक्त और आमाशय में दिखाई देता है, जैसे—दाह, दुर्गंध, अम्लता, रक्तदोष आदि।


साम पित्त के लक्षण

जब पित्त दोष आम के साथ संयुक्त हो जाता है, तब उसे साम पित्त कहा जाता है। इसके प्रमुख लक्षण हैं—

  • दुर्गंधयुक्त

  • हरित अथवा कृष्ण वर्ण

  • अम्ल रस प्रधान

  • स्थिर एवं गुरु स्वरूप


निराम पित्त के लक्षण

जब पित्त दोष आम से मुक्त होकर शुद्ध अवस्था में होता है, तब उसे निराम पित्त कहा जाता है। इसके लक्षण हैं—

  • पीत वर्ण

  • कटु एवं तिक्त रस प्रधान

  • अस्थिर

  • उष्ण स्वभाव

निष्कर्षतः, निराम पित्त में मुख्य रूप से कटु-तिक्त रस के रूक्ष एवं उष्ण गुण प्रकट होते हैं, जबकि लवण और अम्ल रस साम अवस्था में प्रायः गुरु, स्निग्ध और द्रव गुणों के साथ दिखाई देते हैं।


पित्त दोष के मानसिक एवं सात्त्विक प्रभाव

शार्ङ्गधर संहिता के अनुसार पित्त दोष के सात्त्विक गुणों के कारण—

  • प्रसाद

  • मेधा (बुद्धि)

  • शौर्य

  • हर्ष

जैसे सकारात्मक गुणों का विकास होता है।

किन्तु जब पित्त में वात एवं कफ का संयोग हो जाए अथवा रज और तम गुणों का प्रभाव बढ़ जाए, तब पित्त विकृत होकर अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न करता है।

“तच्च पित्तं प्रकुपितं विकारान् कुरुते बहून्।”
(चरक संहिता, सूत्रस्थान 17:114)

ऐसी अवस्था में रोगी में—

  • अधिक धूप एवं गर्मी से बेचैनी

  • क्रोध

  • ईर्ष्या

  • मानसिक तनाव

  • दाह एवं उग्रता

जैसे लक्षण स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगते हैं। यद्यपि ये लक्षण कभी-कभी स्वतंत्र कारणों से भी प्रकट हो सकते हैं, फिर भी इनका मूल संबंध प्रायः पित्त दोष की वृद्धि से ही होता है।

पित्त दोष की चिकित्सा विधि 

अब हम पित्त दोष की चिकित्सा उदावर्त तथा ग्रहणी रोग के आधार पर चर्चा करेंगे, क्योंकि वर्तमान समय में रोगियों में यही दो अवस्थाएँ अधिक देखने को मिलती हैं।

ग्रहणी रोग की आयुर्वेदिक चिकित्सा

ग्रहणी रोग में मुख्य रूप से पित्त दोष की विकृति पाई जाती है, जो सीधे पाचन अग्नि (जठराग्नि) को प्रभावित करती है। जब पाचन अग्नि कमजोर या असंतुलित हो जाती है, तब भोजन का सही पाचन नहीं हो पाता और ग्रहणी रोग उत्पन्न होता है।

ग्रहणी रोग की चिकित्सा में पित्त शमन करने वाली आयुर्वेदिक औषधियों, उचित आहार-विहार तथा नियमित दिनचर्या का विशेष महत्व होता है। हल्का, सुपाच्य और पित्त को शांत करने वाला भोजन पित्त ग्रहणी रोग में अत्यंत लाभकारी माना जाता है। साथ ही तैलीय, तीखा, अत्यधिक खट्टा एवं गरिष्ठ भोजन से परहेज करना आवश्यक होता है।

समुचित आयुर्वेदिक उपचार, संतुलित आहार और सही जीवनशैली अपनाकर ग्रहणी रोग को प्रभावी रूप से नियंत्रित किया जा सकता है।

ग्रहणी चिकित्सा 

ग्रहणी का मतलब होता है जठराग्नि तथा पित्त धराकला में होने वाली गड़बड़ी से खाया हुआ भोजन सही तरीका से न पचना तथा पेट साफ से संबंधित अनेक विकार यहां दिखता है। 

ग्रहणी रोग क्या है इसके बारे में विस्तृत जानकारी पाने के लिए इस लिंक में क्लिक करें और वहां ग्रहणी लिखिए जो भी लक्षण दिखेगा वह सभी इस रोग का लक्षण है इस लिंक से आपको बहुत सारी बातें जानने को मिलेगा।

यहाँ आपके दिए गए पाठ को SEO-friendly, सुव्यवस्थित और चिकित्सकीय हिंदी में प्रस्तुत किया गया है:


लीन पित्त और ग्रहणी रोग

ग्रहणी चिकित्सा में लीन पित्त की अवधारणा

ग्रहणी चिकित्सा प्रकरण में पित्त दोष की लीन अवस्था का विशेष उल्लेख किया गया है। जब दुष्ट पित्त आम रूप में पक्वाशय (बड़ी आंत) में स्थित रहता है और स्वयं बाहर निकलने में समर्थ नहीं होता, तब उसे लीन पित्त कहा जाता है।

आचार्यों के अनुसार—

लीनं पक्वाशयस्थं वाऽप्यामं स्राव्यं सदीपनैः।
शरीरानुगते सामे रसे लङ्घनपाचनम्॥

अर्थात जब आम अवस्था में स्थित पित्त न तो उर्ध्वगामी होता है और न ही बहिर्गमन के लिए उद्यत रहता है, अथवा पक्वाशय में बैठा रहता है, तब अग्निदीपन द्रव्यों से युक्त विरेचन औषधियों के द्वारा दोषों को बाहर निकालना चाहिए। यदि दोष शरीर में साम अवस्था में फैले हों, तो पहले लङ्घन और पाचन करना आवश्यक होता है।


लीन पित्त की पहचान

इस अवस्था में रोगी को बार-बार पित्तजन्य लक्षण दिखाई देते हैं, किंतु ये लक्षण निरंतर नहीं होते।

  • अपथ्य आहार-विहार करने पर लक्षण उभरते हैं

  • सामान्य दिनचर्या में कोई विशेष समस्या नहीं रहती

  • एलोपैथिक जाँचों में कोई स्पष्ट रोग नहीं दिखता

यही लीन पित्त की विशेष पहचान है।


लीन पित्तज ग्रहणी की चिकित्सा विधि

ऐसी स्थिति में निम्नलिखित क्रम से चिकित्सा करनी चाहिए—

  1. आवश्यकता अनुसार  लङ्घन (उपवास या अल्पाहार)

  2. आवश्यकता अनुसार अग्निदीपन औषधियों द्वारा पाचन शक्ति को जाग्रत करना

  3. पूर्वकर्म सहित वमन कर्म

  4. तत्पश्चात विधिपूर्वक विरेचन कर्म


पित्तज ग्रहणी में औषधीय सिद्धांत

पित्तज ग्रहणी में

  • तिक्त (कड़वा)

  • मधुर (मीठा)
    रसयुक्त दीपन औषधियों का प्रयोग अत्यंत हितकर माना गया है।


आहार चिकित्सा (Diet Therapy)

रोगी को निम्न प्रकार का आहार देना चाहिए—

  • विदाह उत्पन्न न करने वाला लघु आहार

  • सिद्ध अन्न में तिक्त रसयुक्त द्रव्य मिलाकर सेवन

  • जांगल पशु-पक्षियों का मांसरस

  • मूँग या मसूर का यूष

  • दीपन- औषधियों एवं घृत के साथ भोजन

  • भोजन को खट्टे अनार के रस से युक्त करना

इसके अतिरिक्त—

  • तिक्तक घृत (जैसा कुष्ठाधिकार में वर्णित है)

  • या दीपन औषधियों के चूर्ण
    का प्रयोग कर जठराग्नि को प्रदीप्त करना चाहिए।


विरेचन हेतु उपयोगी द्रव्य

विरेचन कर्म के लिए निम्न द्रव्यों का प्रयोग किया जा सकता है—

  • फालसा

  • अमलतास

  • मुनक्का


उपचार के दौरान आहार क्रम

विरेचन के पश्चात रोगी को —

  • पेया, विलेपी आदि क्रमिक आहार
    देकर धीरे-धीरे अग्नि को प्रबल करना चाहिए।

जब दोष साम अवस्था से निराम अवस्था में आ जाएँ, तब—

  • घृत सेवन (स्नेहपान)
    द्वारा जठराग्नि को सुदृढ़ करना चाहिए।


निष्कर्ष

लीन पित्तज ग्रहणी एक सूक्ष्म अवस्था है, जिसमें रोग स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देता, किंतु अनुचित आहार-विहार से बार-बार समस्या उत्पन्न होती है। सही आयुर्वेदिक शोधन, दीपन-पाचन, उचित आहार और घृत प्रयोग से इस रोग का सफल उपचार संभव है।


पित्तज ग्रहणी में उपयोगी चूर्ण

निम्न चूर्णों का प्रयोग शमन चिकित्सा में लाभकारी होता है—

  • नागराद्य चूर्ण

  • भूनिम्बादि चूर्ण

  • वचादि चूर्ण

  • किरातादि चूर्ण

इन चूर्णों को मधु, जौ से बनी मदिरा, मुनक्का से निर्मित मदिरा अथवा शीत जल के साथ रोगी की प्रकृति एवं अवस्था अनुसार उचित मात्रा में देना चाहिए।


पित्तज ग्रहणी में तक्र एवं आहार चिकित्सा

  • मीठा बनाकर तक्र का सेवन करें।
    आधा मक्खन निकाला हुआ तक्र पित्तज ग्रहणी में श्रेष्ठ पथ्य माना गया है।

  • मण्ड, पेया एवं यवागू को
    तिक्तरसयुक्त द्रव्यों के क्वाथ में सिद्ध कर सेवन कराना चाहिए।

  • तिक्तरसयुक्त लघु अन्न का सेवन लाभप्रद होता है।


पथ्य आहार

पित्तज ग्रहणी में निम्न आहार हितकर माने गए हैं—

  • अनार का रस

  • कच्चे केले की सब्जी

  • पका हुआ गूलर

  • मखाना या धान्यलाजा को पकाकर एवं मीठा बनाकर देना


निष्कर्ष

पित्तज ग्रहणी में शमन चिकित्सा के अंतर्गत घृत, तिक्त एवं मधुर रसयुक्त औषधियाँ, हल्का सुपाच्य आहार और उचित अनुपान का प्रयोग पित्त दोष को शांत करता है तथा पाचन शक्ति को स्थिर करता है। सही विधि से की गई शमन चिकित्सा रोग के पुनरावृत्ति को रोकने में सहायक होती है।

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उदावर्त प्रकरणोक्त चिकित्सा (चरक संहिता अनुसार)

चरक संहिता के उदावर्त प्रकरण में पित्त दोष से संबंधित उदावर्त की चिकित्सा का स्पष्ट वर्णन किया गया है। इस प्रकरण के अनुसार, जब उदावर्त में पित्त की विकृति प्रधान हो, तब उपचार क्रमबद्ध एवं चरणबद्ध रूप से करना चाहिए।


पित्तज उदावर्त की प्रारंभिक चिकित्सा

आचार्य चरक के अनुसार—

  • पित्त विरेचन कारक द्रव्यों से सिद्ध चावल एवं रोटी रोगी को खिलानी चाहिए।

  • भोजन के पश्चात निशोथ चूर्ण जल के साथ सेवन कराना चाहिए, जिससे पित्त का शमन एवं मल प्रवृत्ति सुगम होती है।


निरुह बस्ति का प्रयोग

यदि केवल आहार एवं चूर्ण प्रयोग से रोगी को पर्याप्त लाभ न मिले, तो—

  • मधुर एवं तिक्त रसयुक्त द्रव्यों से सिद्ध निरुह बस्ति देनी चाहिए।
    यह बस्ति पित्त के साथ-साथ वात को भी संतुलित करती है और उदावर्त के लक्षणों को कम करती है।


विरेचन कर्म

यदि निरुह बस्ति से भी अपेक्षित परिणाम न मिले, तो—

  • 7 दिन के अंतराल के बाद,

  • विधिपूर्वक पूर्वकर्म (स्नेहन एवं स्वेदन) करते हुए

  • स्नेहपान सहित विरेचन कर्म करना चाहिए।

यह प्रक्रिया पित्त दोष का सम्यक् शोधन कर रोग की जड़ पर प्रभाव डालती है।


रूक्षता एवं मल बिवंध में अनुवासन बस्ति

यदि उपरोक्त उपचारों के पश्चात—

  • रोगी में अधिक रूक्षता उत्पन्न हो जाए

  • या मल बिवंध (कब्ज) की समस्या बढ़ जाए

तो—

  • 7 दिन के पश्चात अनुवासन बस्ति देना उचित होता है।
    अनुवासन बस्ति शरीर में स्निग्धता प्रदान कर वात-पित्त को संतुलित करती है।


निष्कर्ष

चरक संहिता के उदावर्त प्रकरण में वर्णित यह चिकित्सा पद्धति बताती है कि पित्तज उदावर्त का उपचार क्रमशः आहार, औषध, बस्ति एवं शोधन कर्म के माध्यम से करना चाहिए। रोगी की अवस्था के अनुसार उचित चिकित्सा चयन करने से उदावर्त रोग में उत्तम परिणाम प्राप्त होते हैं।


यहाँ आपके दिए गए पाठ को SEO-friendly, सुव्यवस्थित आयुर्वेदिक हिंदी में लिखते हुए ब्लॉग के समापन (Conclusion) सहित प्रस्तुत किया गया है:


पित्त दोष की शमन चिकित्सा (पैत्तिक ग्रहणी एवं संबंधित विकार)

पित्त दोष की विकृति से उत्पन्न ग्रहणी एवं उससे संबंधित रोगों में शमन चिकित्सा अत्यंत प्रभावशाली मानी गई है। इस चिकित्सा में पित्त को शांत करने वाले औषधीय चूर्णों, उचित अनुपान तथा आहार-विहार का विशेष महत्व होता है।


नागराद्य चूर्ण

उपयोग

  • रक्तातिसार

  • गुदशूल

  • प्रवाहिका

  • सामान्य पैत्तिक ग्रहणी

  • रक्तस्त्रावयुक्त पैत्तिक ग्रहणी

  • अर्श (बवासीर)

संघटन द्रव्य
सोंठ, अतीस, मोथा, घाय के फूल, रसौंत, कुटजत्वक्, इन्द्रजौ, पाठा, बेलगिरी, कटुकी –
इन सभी द्रव्यों के चूर्ण को समांश में लेकर मिश्रण करें।

सेवन विधि
इस चूर्ण में शहद का प्रक्षेप देकर तण्डुलोदक (चावल का माड़) के अनुपान से सेवन कराएं।

गुण एवं प्रभाव
यह चूर्ण पित्त दोष को शांत करता है, रक्तस्त्राव को नियंत्रित करता है तथा गुदशूल और प्रवाहिका में अत्यंत प्रशस्त माना गया है।


भूनिम्बाद्य चूर्ण

उपयोग

  • पित्तज ग्रहणी

  • पतला पीला मल, मल के साथ खून एवं आंव

  • तीव्र प्यास, दाह

  • मूत्र का लाल रंग

  • अरुचि एवं ज्वर

संघटन द्रव्य

  • चिरायता – 1 भाग

  • कटुकी – 1 भाग

  • त्रिकटु – 1 भाग

  • मोथा – 1 भाग

  • इन्द्रजौ – 1 भाग

  • चित्रक – 2 भाग

  • कुटजत्वक् – 16 भाग

इन सभी द्रव्यों को भली-भांति मिश्रित करें।

सेवन विधि
इस चूर्ण को गुड़ के ठंडे शरबत के साथ सेवन कराना चाहिए।

गुण एवं प्रभाव
यह चूर्ण पित्तज विकारों में विशेष रूप से लाभकारी है तथा जठरांत्र तंत्र में उत्पन्न दाह, प्यास एवं रक्तयुक्त अतिसार को नियंत्रित करता है।


निष्कर्ष (Conclusion)

पित्त दोष की शमन चिकित्सा में नागराद्य चूर्ण एवं भूनिम्बाद्य चूर्ण जैसे आयुर्वेदिक योग अत्यंत प्रभावशाली सिद्ध होते हैं। ये योग पित्त को शांत करने के साथ-साथ ग्रहणी, रक्तातिसार, प्रवाहिका, गुदशूल एवं अर्श जैसे जटिल विकारों में भी उत्तम परिणाम प्रदान करते हैं। उचित अनुपान, पथ्य आहार और संयमित दिनचर्या के साथ इन औषधियों का प्रयोग करने से पाचन अग्नि सुदृढ़ होती है और रोग की पुनरावृत्ति की संभावना कम हो जाती है।
इस प्रकार आयुर्वेद में वर्णित शमन चिकित्सा पित्तज ग्रहणी एवं संबंधित रोगों के उपचार में एक सुरक्षित, प्रभावी और दीर्घकालिक समाधान प्रदान करती है।

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