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सूर्य नमस्कार: सिर्फ व्यायाम नहीं यह तो बुद्धि और बल वृद्धि का मशीन है

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सूर्य नमस्कार का वैज्ञानिक आधार और आयुर्वेदिक महत्व के बारे में किसी ने इस विषय में PhD किया है उन्होंने लंबा चौड़ा इस विषय में थीसिस लिखा हुआ था मैंने संपूर्ण सूर्य नमस्कार के बारे में उस थीसिस को पढ़ने के बाद उसमें एक छोटा सा अत्यधिक महत्वपूर्ण बात जो मेरे दिल को लग गया वहीं बात यहां आपके लिए शेयर कर रहा हूं यदि आपके लिए महत्वपूर्ण होगा तो मेरे इस youtube link में आकर कमेंट में जरूर बताइए।


Surya Namaskar ka Vaigyanik Aadhar

(शरीर, मन और बुद्धि के समन्वित विकास का आयुर्वेदिक-वैज्ञानिक दृष्टिकोण)**

आज के युग में स्वास्थ्य को अक्सर केवल शारीरिक बल, मांसपेशियों की मजबूती और सहनशक्ति के रूप में समझा जाता है। लोग अधिक व्यायाम, भारी वर्कआउट और अत्यधिक शारीरिक श्रम को ही स्वास्थ्य का मापदंड मान बैठे हैं। परंतु आयुर्वेद और योगशास्त्र हमें सिखाते हैं कि संपूर्ण स्वास्थ्य केवल शरीर से नहीं, बल्कि मन, बुद्धि और चेतना के संतुलन से प्राप्त होता है

यही कारण है कि कई बार अत्यधिक बलवान शरीर होने के बावजूद व्यक्ति में

  • एकाग्रता की कमी

  • चिड़चिड़ापन

  • स्मृति दुर्बलता

  • निर्णय क्षमता की कमजोरी

  • मानसिक अस्थिरता

देखी जाती है। इसका मूल कारण शरीर और मन के बीच उत्पन्न असंतुलन है।

इसी असंतुलन को दूर करने के लिए हमारे पूर्वाचार्यों ने एक ऐसी साधना दी, जो न केवल व्यायाम है, न केवल ध्यान है, बल्कि शरीर-मन-बुद्धि का समन्वित विज्ञान है — सूर्य नमस्कार


शरीर और मन का द्वंद्व – आयुर्वेदिक दृष्टि

आयुर्वेद के अनुसार शरीर और मन एक ही सत्ता के दो पक्ष हैं:

  • शरीर (Sharira) → स्थूल, कर्मप्रधान, बल और गति से जुड़ा

  • मन-बुद्धि (Manas–Buddhi) → सूक्ष्म, चेतन, स्मृति और विवेक से जुड़ा

यदि शरीर की गतिविधियाँ अत्यधिक बढ़ जाएँ और मन की साधना न हो, तो शरीर का तंत्र बल, मांस और हार्मोनल सक्रियता में व्यस्त हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप मन और बुद्धि से जुड़े तत्त्वों का पोषण कम होने लगता है।

आयुर्वेद इसे इस प्रकार समझाता है:

  • अत्यधिक शारीरिक श्रम → वात वृद्धि

  • वात वृद्धि → बुद्धि, स्मृति और एकाग्रता का क्षय

  • ओज और शुक्र का ह्रास → मानसिक स्थिरता में कमी

इसलिए केवल भारी व्यायाम को स्वास्थ्य का पूर्ण उपाय नहीं माना गया।


केवल ध्यान या केवल व्यायाम – दोनों अपूर्ण

कुछ लोग केवल ध्यान, एकाग्रता और मानसिक साधना पर जोर देते हैं और शरीर की उपेक्षा करते हैं। इससे:

  • मन तो शांत होता है

  • पर शरीर में बल, सहनशक्ति और प्रतिरोधक शक्ति का अभाव हो सकता है

वहीं दूसरी ओर केवल शारीरिक व्यायाम:

  • शरीर को मजबूत करता है

  • पर मन को अस्थिर, उग्र या चंचल बना सकता है

तो प्रश्न उठता है —
ऐसा क्या किया जाए जिससे व्यक्ति बलवान भी हो और बुद्धिमान भी?

यहीं सूर्य नमस्कार का वास्तविक वैज्ञानिक आधार प्रकट होता है।


सूर्य नमस्कार – न व्यायाम, न ध्यान, बल्कि समन्वय

सूर्य नमस्कार को केवल योगासन मान लेना एक अधूरा दृष्टिकोण है। वास्तव में सूर्य नमस्कार:

  • शारीरिक व्यायाम है

  • प्राणायाम है

  • ध्यानात्मक प्रक्रिया है

  • हार्मोनल बैलेंसिंग तकनीक है

  • नाड़ी तंत्र का शुद्धिकरण है

इसीलिए आयुर्वेद और योग दोनों में सूर्य नमस्कार को संपूर्ण साधना माना गया है।


सूर्य का वैज्ञानिक महत्व

सूर्य केवल एक खगोलीय पिंड नहीं है। वैज्ञानिक दृष्टि से सूर्य:

  • पृथ्वी पर जीवन का मूल स्रोत

  • जैविक घड़ी (Circadian Rhythm) का नियंत्रक

  • हार्मोनल संतुलन का नियामक

आधुनिक विज्ञान भी मानता है कि सूर्य प्रकाश से:

  • मेलाटोनिन

  • सेरोटोनिन

  • कोर्टिसोल
    जैसे हार्मोन संतुलित होते हैं।

आयुर्वेद सूर्य को:

  • आत्मा का कारक

  • अग्नि का स्रोत

  • बुद्धि और तेज का अधिष्ठाता

मानता है।


सूर्य नमस्कार और हार्मोनल संतुलन

सूर्य नमस्कार के दौरान शरीर के लगभग सभी अंतःस्रावी ग्रंथियाँ सक्रिय होती हैं:

  • पिट्यूटरी

  • पीनियल

  • थायरॉयड

  • एड्रिनल

  • गोनैडल ग्रंथियाँ

इससे:

  • टेस्टोस्टेरोन संतुलित रूप से बढ़ता है

  • शुक्र धातु का संरक्षण होता है

  • ओज की वृद्धि होती है

महत्वपूर्ण बात यह है कि सूर्य नमस्कार में अत्यधिक उत्तेजना नहीं होती, इसलिए हार्मोन असंतुलन नहीं बनता।


सूर्य नमस्कार और नाड़ी तंत्र

आयुर्वेद के अनुसार शरीर में:

  • इड़ा

  • पिंगला

  • सुषुम्ना

तीन प्रमुख नाड़ियाँ हैं।

सूर्य नमस्कार में:

  • आगे झुकना

  • पीछे झुकना

  • श्वास-प्रश्वास का नियंत्रण

इन तीनों नाड़ियों को संतुलित करता है।
इड़ा-पिंगला का संतुलन → मानसिक स्थिरता
सुषुम्ना की सक्रियता → बुद्धि और चेतना का विकास


सूर्य नमस्कार और वात-पित्त-कफ संतुलन

सूर्य नमस्कार त्रिदोष संतुलन की एक श्रेष्ठ क्रिया है:

  • वात → नियंत्रित गति और स्थिरता

  • पित्त → अग्नि का संतुलन, न कि उग्रता

  • कफ → जड़ता का नाश, स्फूर्ति की वृद्धि

इसी कारण यह हर प्रकृति के व्यक्ति के लिए उपयुक्त है, जब उचित संख्या और गति से किया जाए।


सूर्य नमस्कार और ओज की वृद्धि

ओज आयुर्वेद में जीवन शक्ति का सार है।
अत्यधिक व्यायाम:

  • ओज को क्षीण कर सकता है

परंतु सूर्य नमस्कार:

  • शरीर को थकाता नहीं

  • बल्कि ऊर्जा उत्पन्न करता है

नियमित सूर्य नमस्कार से:

  • रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ती है

  • मानसिक प्रसन्नता आती है

  • दीर्घकालिक स्वास्थ्य प्राप्त होता है


सूर्य नमस्कार क्यों बल और बुद्धि दोनों बढ़ाता है

सूर्य नमस्कार की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह:

  • शरीर को श्रम में नहीं डालता

  • मन को निष्क्रिय नहीं करता

बल्कि दोनों को एक ही दिशा में प्रवाहित करता है।

यही कारण है कि:

  • शरीर मजबूत होता है

  • बुद्धि तीक्ष्ण होती है

  • स्मृति और एकाग्रता बढ़ती है

  • निर्णय क्षमता विकसित होती है


पूर्वाचार्यों का दृष्टिकोण

हमारे ऋषियों ने सूर्य नमस्कार को:

  • ब्रह्ममुहूर्त

  • संयमित श्वास

  • श्रद्धा और एकाग्रता

के साथ करने की सलाह दी।

यह केवल शारीरिक क्रिया नहीं, बल्कि:

“शरीर को सूर्य और मन को चेतना से जोड़ने की प्रक्रिया” है।


निष्कर्ष

आज जब स्वास्थ्य को केवल जिम और मांसपेशियों तक सीमित कर दिया गया है, तब सूर्य नमस्कार हमें याद दिलाता है कि:

सच्चा स्वास्थ्य वह है जिसमें शरीर बलवान हो,
मन शांत हो और
बुद्धि प्रकाशमान हो।

सूर्य नमस्कार कोई साधारण योगासन नहीं, बल्कि:

  • आयुर्वेद

  • योग

  • प्राण विज्ञान

  • हार्मोनल साइंस

का एक अद्भुत संगम है।

इसी में इसका वैज्ञानिक आधार छिपा है।

 

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