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Ayurvedic Agni and Ama:आम अवस्था में चिकित्सा क्यों नहीं करनी चाहिए? | अग्नि व लंघन सिद्धांत

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यदि आप किसी गंभीर रोग से जूझ रहे हो,बहुत सारे एलोपैथिक चिकित्सा कर करके थक चुके हो अब आप किसी आयुर्वेदिक डॉक्टर के पास जाने का मन बना रहे हो तो चिकित्सक के पास जाने से पहले आपको अपने शारीरिक अवस्थाओं के बारे में कुछ सटीक जानकारी रखना जरूरी है। यदि आप शरीर के इन अवस्थाओं को जाने या समझे बगैर चिकित्सक के पास जाते हो और कोई आयुर्वेदिक दवाई लेने की बात करते हो तो यह प्रक्रिया आपके रोगों को और बढ़ाने वाला हो सकता है आइये समझते हैं आपको आयुर्वेदिक चिकित्सा आपके शरीर के किस लक्षण को प्राप्त होने पर ही प्रारंभ करना है।

 दोष पक्वता, अग्नि और सम्यक् लंघन का शास्त्रीय विश्लेषण

इस विस्तृत लेख में हम आम अवस्था में चिकित्सा क्यों नहीं करनी चाहिए? इस विषय को चरक संहिता के सूत्रों के आधार पर गहराई से समझेंगे, साथ ही सम्यक् लंघन के लक्षण, अग्नि की परीक्षा, तथा संसर्ग एवं अवरोध की चिकित्सा के सिद्धांतों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

Understanding Agni and Proper Digestion in Ayurveda


आयुर्वेद का मूल सिद्धांत है — “दोष पक्व होना चाहिए, अग्नि प्रज्वलित होना चाहिए।” जब तक जठराग्नि प्रदीप्त न हो और दोष पक्व अवस्था में न आएँ, तब तक शोधन, स्नेहन, अभ्यंग, बस्ति, निरूह, व्यायाम आदि पंचकर्म करना शास्त्रसम्मत नहीं माना गया है।

देखे

  • विधियुक्त, सात्म्य, हितकर, मात्रापूर्वक किया हुआ आहार विना कष्ट के परीणमत होरहा है या नहीं।
  • परिणमन होने में कितना समय लगता है,
  • परिणमन के साथ कोई आपत्ति तो नहीं होती है

उदरशूल, अम्लपित्त, पेट में आवाज, गैस, कब्जीयत होती है तो अग्नि मन्द से आम है मल प्रवृत्ति सही समय पर हो रहा है तो अग्नि सम है।

1. दोष पक्वता और अग्नि की अनिवार्यता

आयुर्वेद में कहा गया है कि जब तक दोष पक्व नहीं होते और अग्नि दीप्त नहीं होती, तब तक कोई भी शोधन चिकित्सा करना उचित नहीं है।

यदि रोगी द्वारा लिया गया आहार —

  • विधियुक्त (शास्त्रानुसार)

  • सात्म्य (स्वभावानुकूल)

  • हितकर (स्वास्थ्यप्रद)

  • मात्रापूर्वक (उचित मात्रा में)

होने पर भी बिना कष्ट के परिणमन (पाचन) नहीं हो रहा, तो स्पष्ट है कि जठराग्नि मंद है और आम उत्पन्न हो रहा है।

परिणमन की परीक्षा कैसे करें?

  • भोजन के बाद भारीपन तो नहीं?

  • खट्टी डकार, अम्लपित्त, उदरशूल तो नहीं?

  • पेट में गुड़गुड़ाहट, गैस, कब्ज तो नहीं?

  • मल प्रवृत्ति समय पर और बिना कष्ट के हो रही है या नहीं?

यदि मलप्रवृत्ति समय पर हो, भूख समय पर लगे, और कोई आपत्ति न हो — तो अग्नि सम है

यदि उदरशूल, अम्लपित्त, पेट में आवाज, गैस, कब्ज — ये लक्षण दिखें तो यह मन्दाग्नि एवं आम अवस्था का सूचक है।

यही बिंदु बार-बार स्मरण रखना चाहिए कि —
  आम अवस्था में चिकित्सा क्यों नहीं करनी चाहिए?

क्योंकि इस समय शरीर की अग्नि रोग का सामना करने में सक्षम नहीं होती। 

Ayurvedic Agni and Ama: Correct Treatment Principles Before Panchakarma


2. आम अवस्था में चिकित्सा क्यों नहीं करनी चाहिए?

जब शरीर में आम उपस्थित हो, तब स्नेहन, अभ्यंग, बस्ति, निरूह, व्यायाम आदि करने से रोग बढ़ सकता है।

यदि रोगी आमावस्था में है, तो केवल आम पाचन करने वाली चिकित्सा करनी चाहिए — जैसे दीपन पाचन व्यायाम स्वेदन,रुक्षण उपवास विरेचन वमन निरुह,नस्य,प्यास,खुली हवा, खुली धूप,यह सभी लंघन चिकित्सा का प्रकार है। रोगी में जहां जिसकी जितनी जरूरत होती है वहां उतना ही विचार पूर्वक प्रयोग करना चाहिए। आम (toxin) को digest करने के लिए लंघन सर्वोत्तम प्रक्रिया है.

शास्त्र में स्पष्ट निर्देश है कि —

जब तक निम्न तीन लक्षण प्रकट न हों, तब तक पंचकर्म न करें:

  1. लंघन के लक्षण प्रकट हों

  2. व्याधिवल कम हो

  3. अग्नि दीप्त हो

जब तक ये तीनों संकेत न मिलें, तब तक किसी भी प्रकार की भारी चिकित्सा करना रोग वृद्धि का कारण बन सकता है।

इसीलिए पुनः समझना आवश्यक है —
आम अवस्था में चिकित्सा क्यों नहीं करनी चाहिए?
क्योंकि यह अवस्था रोग की जड़ है, और पहले जड़ को शांत करना आवश्यक है।


3. परतंत्र वात प्रकोप — संसर्ग और अवरोध की चिकित्सा

आम अवस्था में यदि वात व्याधि के लक्षण दिखते हैं, तो वह स्वतंत्र वात प्रकोप नहीं, बल्कि परतंत्र वात होता है।

चरक संहिता (च.सि. १/५८) में कहा गया है:

मेदः कफाभ्यामनिलो निरुद्धः शूलाङ्गसुप्तिश्वयथून् करोति।

अर्थात् — जब वात मेद या कफ द्वारा अवरुद्ध हो जाता है, तब शूल, अंगसुप्ति (सुन्नपन), सूजन आदि उत्पन्न होते हैं।

इस अवस्था में यदि केवल वात शामक औषधि — जैसे स्नेहपान — दे दिया जाए, तो रोग और बढ़ सकता है।

क्योंकि —

  • मूल कारण मेद/कफ/आम है

  • वात केवल अवरुद्ध है

इसलिए शास्त्रीय चिकित्सा सूत्र है —

“संसर्ग एवं अवरोध करने वाले दोषों की चिकित्सा सर्वप्रथम करनी चाहिए।”

उसके बाद ही वात की चिकित्सा करें।

यही कारण है कि आम अवस्था में चिकित्सा क्यों नहीं करनी चाहिए? यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है।


4. सम्यक् लंघन के लक्षण (चरक सूत्र अनुसार)

चरक संहिता सूत्रस्थान २२ में सम्यक् लंघन के लक्षण वर्णित हैं —

वातमूत्रपुरीषाणां विसर्गे गात्रलाघवे ।
हृदयोद्गारकण्ठास्यशुद्धो तन्द्राक्लमे गते ॥

सम्यक् लंघन के लक्षण

✔ अधोवायु, मल, मूत्र का बिना कष्ट विसर्जन
✔ शरीर में लाघव
✔ हृदय, कण्ठ, मुख की शुद्धि
✔ तन्द्रा और क्लांति का अभाव

यदि रोगी कहे —

  • कब्ज है

  • पेशाब खुलकर नहीं आता

  • गैस नहीं निकलती

  • मन अशांत है

  • खट्टी डकार आती है

  • गले में कफ अटका है

  • शरीर भारी है

तो यह विपरीत लक्षण हैं — अर्थात् अभी लंघन नहीं हुआ, आम उपस्थित है।


5. लंघन की आवश्यकता के संकेत

शास्त्र में आगे कहा गया है —

स्वेदे जाते रुचौ चैव क्षुत्पिपासासहोदये।
कृत लङ्गनमादेश्यं निर्व्यथे चान्तरात्मनि॥

यदि —

  • पसीना नहीं आ रहा

  • भोजन में रुचि नहीं

  • भूख-प्यास समय पर नहीं

  • शरीर में भारीपन

तो यह लंघन की आवश्यकता दर्शाते हैं।

जब इनका विपरीत हो —

  • रुचि उत्पन्न हो

  • भूख समय पर लगे

  • हल्कापन आए

तो समझें कि लंघन सफल हुआ।


6. लंघन कैसे करें?

लंघन चिकित्सा के प्रमुख प्रकार —

  • दीपन

  • पाचन

  • व्यायाम

  • स्वेदन

  • रुक्षण

  • उपवास

  • विरेचन

  • वमन

  • निरूह बस्ति

  • नस्य

  • प्यास सहन

  • खुली हवा व धूप

इनमें से रोगी की अवस्था अनुसार चयन करना चाहिए।

👉 बिना विचार के किसी भी रोग में “सिंहनाद गुग्गुल” या अन्य औषधि देना शास्त्रसम्मत नहीं।

क्योंकि —

अवस्था अनुसार चिकित्सा न करना मूर्खता है।


7. हेतु विपरीत एवं व्याधि विपरीत चिकित्सा

आयुर्वेद का क्रम है —

  1. हेतु विपरीत चिकित्सा

  2. उसके बाद व्याधि विपरीत चिकित्सा

यदि सीधे व्याधि विपरीत चिकित्सा कर दी जाए, और हेतु बना रहे — तो रोग जड़ से समाप्त नहीं होगा।

उदाहरण —
गठिया में यदि आम उपस्थित है और सीधे वात शामक औषधि दे दी जाए, तो रोग और जटिल हो सकता है।

इसलिए पुनः स्पष्ट है —
आम अवस्था में चिकित्सा क्यों नहीं करनी चाहिए?
क्योंकि यह अवस्था दोषों को स्थिर कर देती है और चिकित्सा की दिशा उलटी कर देती है।


8. शास्त्रीय परीक्षण के बाद ही पंचकर्म

जब —

  • लंघन के लक्षण प्रकट हों

  • व्याधिवल कम हो

  • अग्नि प्रदीप्त हो

तभी शास्त्र सम्मत परीक्षण कर पंचकर्म करना चाहिए।

अन्यथा —

  • स्नेहन रोग बढ़ाएगा

  • बस्ति उलटा प्रभाव देगा

  • व्यायाम आम को और फैलाएगा


9. निष्कर्ष

आयुर्वेद का मूल सिद्धांत अत्यंत वैज्ञानिक और क्रमबद्ध है।

✔ पहले अग्नि की परीक्षा
✔ फिर आम की स्थिति का आकलन
✔ पहले लंघन
✔ फिर दोष शोधन

जब तक रोगी आम अवस्था में है, तब तक केवल दीपन-पाचन करना चाहिए।

आम अवस्था में चिकित्सा क्यों नहीं करनी चाहिए?
क्योंकि उस समय शरीर चिकित्सा ग्रहण करने योग्य नहीं होता।

दोष पक्वता, अग्नि प्रदीप्ति और सम्यक् लंघन — ये तीनों आयुर्वेदिक चिकित्सा के आधार स्तंभ हैं।

यदि इनका पालन किया जाए, तो चिकित्सा शीघ्र, सुरक्षित और स्थायी फल देने वाली होती है।

 

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